ग़ज़ल 17

शेर 12

उन की महफ़िल में 'ज़फ़र' लोग मुझे चाहते हैं

वो जो कल कहते थे दीवाना भी सौदाई भी

मिरे चाँद रात सूनी है

बात बनती नहीं सितारों से

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एक भी आफ़्ताब बन सका

लाख टूटे हुए सितारों से

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थक के पत्थर की तरह बैठा हूँ रस्ते में 'ज़फ़र'

जाने कब उठ सकूँ क्या जानिए कब घर जाऊँ

साँस लेने को ही जीना नहीं कहते हैं 'ज़फ़र'

ज़िंदगी थी जो तिरे वस्ल का इम्काँ होता

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पुस्तकें 7

Sada Basahra

 

1961

Shahsawaar

 

1944

Shola-e-Saz

Intikhab-e-Firaq

1945

Unnees Sau Chhiyalees Ki Behtareen Nazmein

 

 

Zahr-e-Khand

 

 

Zindan

 

1944

Zindan

 

1944

 

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