यूसुफ़ ज़फ़र

ग़ज़ल 18

नज़्म 8

शेर 12

उन की महफ़िल में 'ज़फ़र' लोग मुझे चाहते हैं

वो जो कल कहते थे दीवाना भी सौदाई भी

मिरे चाँद रात सूनी है

बात बनती नहीं सितारों से

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एक भी आफ़्ताब बन सका

लाख टूटे हुए सितारों से

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थक के पत्थर की तरह बैठा हूँ रस्ते में 'ज़फ़र'

जाने कब उठ सकूँ क्या जानिए कब घर जाऊँ

हाए ये तवील सर्द रातें

और एक हयात-ए-मुख़्तसर में

पुस्तकें 7

 

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI