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मुज़फ़्फ़र वारसी

1933 - 2011 | लाहौर, पाकिस्तान

मुज़फ़्फ़र वारसी

ग़ज़ल 38

नज़्म 3

 

अशआर 14

ज़िंदगी तुझ से हर इक साँस पे समझौता करूँ

शौक़ जीने का है मुझ को मगर इतना भी नहीं

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हर शख़्स पर किया करो इतना ए'तिमाद

हर साया-दार शय को शजर मत कहा करो

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कुछ कहने से भी छिन जाता है एजाज़-ए-सुख़न

ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है

पहले रग रग से मिरी ख़ून निचोड़ा उस ने

अब ये कहता है कि रंगत ही मिरी पीली है

जभी तो उम्र से अपनी ज़ियादा लगता हूँ

बड़ा है मुझ से कई साल तजरबा मेरा

नअत 2

 

पुस्तकें 14

वीडियो 4

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
मेरी जुदाइयों से वो मिल कर नहीं गया

मुज़फ़्फ़र वारसी

हाथ आँखों पे रख लेने से ख़तरा नहीं जाता

मुज़फ़्फ़र वारसी

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