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मुज़फ़्फ़र वारसी

1933 - 2011 | लाहौर, पाकिस्तान

ग़ज़ल 38

शेर 14

ज़िंदगी तुझ से हर इक साँस पे समझौता करूँ

शौक़ जीने का है मुझ को मगर इतना भी नहीं

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हर शख़्स पर किया करो इतना ए'तिमाद

हर साया-दार शय को शजर मत कहा करो

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कुछ कहने से भी छिन जाता है एजाज़-ए-सुख़न

ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है

पहले रग रग से मिरी ख़ून निचोड़ा उस ने

अब ये कहता है कि रंगत ही मिरी पीली है

लिया जो उस की निगाहों ने जाएज़ा मेरा

तो टूट टूट गया ख़ुद से राब्ता मेरा

पुस्तकें 12

Al-Hamd

 

1984

Bab-e-Haram

 

1976

Bab-e-Haram

 

1984

Bab-e-Haram

 

1992

Barf Ki Nao

 

 

Hisaar

 

1988

Kaba-e-Ishq

 

1989

Khule Dariche Band Hawa

 

1993

Lahja

 

1984

Lahu Ki Hariyali

 

1988

वीडियो 4

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
मेरी जुदाइयों से वो मिल कर नहीं गया

मुज़फ़्फ़र वारसी

हाथ आँखों पे रख लेने से ख़तरा नहीं जाता

मुज़फ़्फ़र वारसी

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