निकहत इफ़्तिख़ार के शेर
जाने किस वक़्त कूच करना हो
अपना सामान मुख़्तसर रखिए
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रोग है हुस्न का या कोई नई साज़िश है
देखते हैं जो मुझे सब तिरी देखा-देखी
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टैग : निगाह
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मैं सारी तल्ख़ियों के मुश्तहर होने से डरती हूँ
अब इस तन्हाई की सब को ख़बर होने से डरती हूँ
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हर उदासी में कई रंग उतर आए हैं
आज फिर तेरी निगाहों से जो दुनिया देखी
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टैग : हिज्र
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बिगड़ कर जा रहे हो तुम निहायत शौक़ से जाओ
ज़रा ठहरो तुम्हारे दर-ब-दर होने से डरती हूँ
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टैग : मोहब्बत
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