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क़ाबिल अजमेरी

1931 - 1962 | हैदराबाद, पाकिस्तान

ग़ज़ल 21

शेर 30

वक़्त करता है परवरिश बरसों

हादिसा एक दम नहीं होता

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तुम मानो मगर हक़ीक़त है

इश्क़ इंसान की ज़रूरत है

रंग-ए-महफ़िल चाहता है इक मुकम्मल इंक़लाब

चंद शम्ओं के भड़कने से सहर होती नहीं

चित्र शायरी 4

बहुत काम लेने हैं दर्द-ए-जिगर से कहीं ज़िंदगी को क़रार आ न जाए

बहुत काम लेने हैं दर्द-ए-जिगर से कहीं ज़िंदगी को क़रार आ न जाए

रास्ता है कि कटता जाता है फ़ासला है कि कम नहीं होता

 

वीडियो 18

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तुम न मानो मगर हक़ीक़त है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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