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रईस सिद्दीक़ी

1957 | दिल्ली, भारत

रईस सिद्दीक़ी के शेर

बस इक ख़ता की मुसलसल सज़ा अभी तक है

मिरे ख़िलाफ़ मिरा आईना अभी तक है

नींद आँखों में बाक़ी इंतिज़ार रहा

ये हाल था तो कोई नेक काम क्या करते

तिरे सुलूक का ग़म सुब्ह-ओ-शाम क्या करते

ज़रा सी बात पे जीना हराम क्या करते