सदफ़ मिर्ज़ा के शेर
जबीनों पर निशाँ सज्दों के हैं हाथों में शमशीरें
अक़ीदे ने तशद्दुद के बदन को ओढ़ रखा है
पलट आए तो हैं हम सुल्ह की शर्तों को ठुकरा कर
मगर पैरों ने सदियों की थकन को ओढ़ रखा है
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