सादिक़ बाजवा के शेर
साक़िया मुहर-ब-लब कर के सिला क्या पाया
हश्र कुछ और ख़मोशी ने बपा रक्खा है
उम्र गुज़री है मगर ख़ुद से जुदा कर न सके
भूलने वाले तिरी याद में क्या रक्खा है
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टैग : याद
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