लब शायरी

महबूब के लबों की तारीफ़-ओ-तहसीन और उनसे शिकवे-शिकायत शायरी में आम है। लबों की ख़ूबसूरती और उनकी ना-ज़ुकी के मज़मून को शायेरों ने नए नए दढिंग से बाँधा है । लबों के शेरी बयान में एक पहलू ये भी रहा है कि उन पर एक गहरी चुप पड़ी हुई है, वो हिलते नहीं आशिक़ से बात नहीं करते। ये लब कहीं गुलाब की पंखुड़ी की तरह नाज़ुक हैं तो कहीं उनसे फूल झड़ते हैं। इस मज़मून में और भी कई दिल-चस्प पहलू हैं। हमारा ये इन्तिख़ाब पढ़िए।

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए

पंखुड़ी इक गुलाब की सी है

मीर तक़ी मीर

क्यूँ परखते हो सवालों से जवाबों को 'अदीम'

होंट अच्छे हों तो समझो कि सवाल अच्छा है

अदीम हाशमी

शौक़ है इस दिल-ए-दरिंदा को

आप के होंट काट खाने का

जौन एलिया

उस के होंटों पे रख के होंट अपने

बात ही हम तमाम कर रहे हैं

जौन एलिया

सो देख कर तिरे रुख़्सार लब यक़ीं आया

कि फूल खिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी

अहमद फ़राज़

कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रक़ीब

गालियाँ खा के बे-मज़ा हुआ

how sweet are your honeyed lips, that even though my foe

was abused by you, is not, in an unhappy state

मिर्ज़ा ग़ालिब

सिर्फ़ उस के होंट काग़ज़ पर बना देता हूँ मैं

ख़ुद बना लेती है होंटों पर हँसी अपनी जगह

अनवर शऊर

तुझ सा कोई जहान में नाज़ुक-बदन कहाँ

ये पंखुड़ी से होंट ये गुल सा बदन कहाँ

लाला माधव राम जौहर

एक दम उस के होंट चूम लिए

ये मुझे बैठे बैठे क्या सूझी

नासिर काज़मी

तिरे लबों को मिली है शगुफ़्तगी गुल की

हमारी आँख के हिस्से में झरने आए हैं

आग़ा निसार

मुस्कुराए बग़ैर भी वो होंट

नज़र आते हैं मुस्कुराए हुए

अनवर शऊर

आता है जी में साक़ी-ए-मह-वश पे बार बार

लब चूम लूँ तिरा लब-ए-पैमाना छोड़ कर

जलील मानिकपूरी

ख़ुदा को मान कि तुझ लब के चूमने के सिवा

कोई इलाज नहीं आज की उदासी का

ज़फ़र इक़बाल

उन लबों ने की मसीहाई

हम ने सौ सौ तरह से मर देखा

ख़्वाजा मीर दर्द

होंटों पर इक बार सजा कर अपने होंट

उस के बाद बातें करना सो जाना

अतीक़ इलाहाबादी

कुछ तो मिल जाए लब-ए-शीरीं से

ज़हर खाने की इजाज़त ही सही

आरज़ू लखनवी

बुझे लबों पे है बोसों की राख बिखरी हुई

मैं इस बहार में ये राख भी उड़ा दूँगा

साक़ी फ़ारुक़ी

किसी को ख़्वाब में अक्सर पुकारते हैं हम

'अता' इसी लिए सोते में होंट हिलते हैं

अहमद अता