रुख़्सार शायरी

शायरी में महबूब के जिस्मानी आज़ा के बयान वाला हिस्सा बहुत दिल-चस्प और रूमान-पर्वर है। यहाँ आप महबूब के रुख़्सार का बयान पढ़ कर ख़ुद अपने बदन में एक झुरझुरी सी महसूस करने लगेंगे। हम यहाँ नई पुरानी शायरी से रुख़्सार को मौज़ू बनाने वाले कुछ अच्छे शेरों का इन्तिख़ाब आप के लिए पेश कर रहे हैं।

उस के रुख़्सार देख जीता हूँ

आरज़ी मेरी ज़िंदगानी है

नाजी शाकिर

अब मैं समझा तिरे रुख़्सार पे तिल का मतलब

दौलत-ए-हुस्न पे दरबान बिठा रक्खा है

The import of this spot upon your face I now detect

The treasure of your beauty does this sentinel protect

The import of this spot upon your face I now detect

The treasure of your beauty does this sentinel protect

क़मर मुरादाबादी

निखर गए हैं पसीने में भीग कर आरिज़

गुलों ने और भी शबनम से ताज़गी पाई

your cheeks with perspiration are all aglow anew

these flowers are now fresher laden with the dew

your cheeks with perspiration are all aglow anew

these flowers are now fresher laden with the dew

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

सो देख कर तिरे रुख़्सार लब यक़ीं आया

कि फूल खिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी

अहमद फ़राज़

आरिज़ों पर ये ढलकते हुए आँसू तौबा

हम ने शोलों पे मचलती हुई शबनम देखी

lord forbid that tears on your cheeks do flow

like dewdrops agonizing on embers all aglow

lord forbid that tears on your cheeks do flow

like dewdrops agonizing on embers all aglow

जोश मलसियानी

तिरे रुख़्सार से बे-तरह लिपटी जाए है ज़ालिम

जो कुछ कहिए तो बल खा उलझती है ज़ुल्फ़ बे-ढंगी

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

पूछो अरक़ रुख़्सारों से रंगीनी-ए-हुस्न को बढ़ने दो

सुनते हैं कि शबनम के क़तरे फूलों को निखारा करते हैं

wipe not the droplets from your face, let beauty's lustre grow

drops of dew when flowers grace, enhance their freshness so

wipe not the droplets from your face, let beauty's lustre grow

drops of dew when flowers grace, enhance their freshness so

क़मर जलालवी

जो उन को लिपटा के गाल चूमा हया से आने लगा पसीना

हुई है बोसों की गर्म भट्टी खिंचे क्यूँकर शराब-ए-आरिज़

अहमद हुसैन माइल

उन के रुख़्सार पे ढलके हुए आँसू तौबा

मैं ने शबनम को भी शोलों पे मचलते देखा

साहिर लुधियानवी

रुख़्सार के अरक़ का तिरे भाव देख कर

पानी के मोल निर्ख़ हुआ है गुलाब का

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रुख़्सार पर है रंग-ए-हया का फ़रोग़ आज

बोसे का नाम मैं ने लिया वो निखर गए

हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा

देखना हर सुब्ह तुझ रुख़्सार का

है मुताला मतला-ए-अनवार का

वली मोहम्मद वली

मुद्दत से इक लड़की के रुख़्सार की धूप नहीं आई

इस लिए मेरे कमरे में इतनी ठंडक रहती है

बशीर बद्र

हाजत नहीं बनाओ की नाज़नीं तुझे

ज़ेवर है सादगी तिरे रुख़्सार के लिए

हैदर अली आतिश

चाहता है इस जहाँ में गर बहिश्त

जा तमाशा देख उस रुख़्सार का

वली मोहम्मद वली

क़ामत तिरी दलील क़यामत की हो गई

काम आफ़्ताब-ए-हश्र का रुख़्सार ने किया

हैदर अली आतिश

जाने किस दम निकल आए तिरे रुख़्सार की धूप

मुद्दतों ध्यान तिरे साया-ए-दर पर रक्खा

अहमद मुश्ताक़