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नाजी शाकिर

1690 - 1744 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 10

शेर 5

उस के रुख़्सार देख जीता हूँ

आरज़ी मेरी ज़िंदगानी है

ज़ुल्फ़ क्यूँ खोलते हो दिन को सनम

मुख दिखाया है तो रात करो

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सैर-ए-बाग़ मिलना मीठी बातें हैं

ये दिन बहार के जान मुफ़्त जाते हैं

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बुलंद आवाज़ से घड़ियाल कहता है कि ग़ाफ़िल

कटी ये भी घड़ी तुझ उम्र से और तू नहीं चेता

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सिवाए गुल के वो शोख़ अँखियाँ किसी तरफ़ को नहीं हैं राग़िब

तो बर्ग-ए-नर्गिस उपर बजा है लिखूँ जो अपने सजन कूँ पतियाँ

पुस्तकें 2

Deewan-e-Shakir Naji

 

1968

दीवान-ए-शाकिर नाजी

मआ मुक़द्दम-ओ-फ़रहंग

1989

 

ऑडियो 7

कमर की बात सुनते हैं ये कुछ पाई नहीं जाती

ज़िक्र हर सुब्ह ओ शाम है तेरा

तेरे भाई को चाहा अब तेरी करता हूँ पा-बोसी

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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