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हसरत अज़ीमाबादी

1727 - 1795 | पटना, भारत

मीर तक़ी मीर के समकालीन, अज़ीमाबाद के प्रतिष्ठित एवं प्रतिनिधि शायर

मीर तक़ी मीर के समकालीन, अज़ीमाबाद के प्रतिष्ठित एवं प्रतिनिधि शायर

हसरत अज़ीमाबादी

ग़ज़ल 41

शेर 25

इश्क़ में ख़्वाब का ख़याल किसे

लगी आँख जब से आँख लगी

भर के नज़र यार देखा कभी

जब गया आँख ही भर कर गया

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बुरा माने तो इक बात पूछता हूँ मैं

किसी का दिल कभी तुझ से भी ख़ुश हुआ हरगिज़

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ज़ुल्फ़-ए-कलमूँही को प्यारे इतना भी सर मत चढ़ा

बे-महाबा मुँह पे तेरे पाँव करती है दराज़

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मोहब्बत एक तरह की निरी समाजत है

मैं छोड़ूँ हूँ तिरी अब जुस्तुजू हुआ सो हुआ

पुस्तकें 2

Deewan-e-Hasrat Azeemabadi

 

1999

दीवान-ए-हसरत अज़ीमाबादी

 

1978

 

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