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कलीम आजिज़

1924 - 2015 | पटना, भारत

क्लासिकी लहजे के प्रमुख और लोकप्रिय शायर

क्लासिकी लहजे के प्रमुख और लोकप्रिय शायर

कलीम आजिज़

ग़ज़ल 55

शेर 66

दर्द ऐसा है कि जी चाहे है ज़िंदा रहिए

ज़िंदगी ऐसी कि मर जाने को जी चाहे है

जाने रूठ के बैठा है दिल का चैन कहाँ

मिले तो उस को हमारा कोई सलाम कहे

दामन पे कोई छींट ख़ंजर पे कोई दाग़

तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो

रखना है कहीं पाँव तो रक्खो हो कहीं पाँव

चलना ज़रा आया है तो इतराए चलो हो

ज़ालिम था वो और ज़ुल्म की आदत भी बहुत थी

मजबूर थे हम उस से मोहब्बत भी बहुत थी

पुस्तकें 12

अभी सुन लो मुझ से

 

1992

Ek Desh Ek Bideshi

Safar Nama Amrica

1981

जब फ़स्ल-ए-बहाराँ आई थी

 

1990

कूचा-ए-जाना जाना

 

2002

मज्लिस-ए-अदब

 

2003

Majlis-e-Adab

 

 

फिर ऐसा नज़ारा नहीं होगा

 

2008

वो जो शाइरी का सबब हुआ

 

1976

वह जो शायरी का सबब हुआ

 

1996

Woh Jo Shayri Ka Sabab Huwa

 

 

चित्र शायरी 7

बेकसी है और दिल नाशाद है अब इन्हीं दोनों से घर आबाद है अब उन्हीं की फ़िक्र में सय्याद है जिन के नग़्मों से चमन आबाद है जो मुझे बर्बाद कर के शाद है उस सितमगर को मुबारकबाद है तुम ने जो चाहा वही हो कर रहा ये हमारी मुख़्तसर रूदाद है हम ने तुम से रख के उम्मीद-ए-करम वो सबक़ सीखा कि अब तक याद है बेबसी बन कर न टपके आँख से दिल में जो इक हसरत-ए-फ़रियाद है

कू-ए-क़ातिल है मगर जाने को जी चाहे है अब तो कुछ फ़ैसला कर जाने को जी चाहे है लोग अपने दर-ओ-दीवार से होशियार रहें आज दीवाने का घर जाने को जी चाहे है दर्द ऐसा है कि जी चाहे है ज़िंदा रहिए ज़िंदगी ऐसी कि मर जाने को जी चाहे है दिल को ज़ख़्मों के सिवा कुछ न दिया फूलों ने अब तो काँटों में उतर जाने को जी चाहे है छाँव वा'दों की है बस धोका ही धोका ऐ दिल मत ठहर गरचे ठहर जाने को जी चाहे है ज़िंदगी में है वो उलझन कि परेशाँ हो कर ज़ुल्फ़ की तरह बिखर जाने को जी चाहे है क़त्ल करने की अदा भी हसीं क़ातिल भी हसीं न भी मरना हो तो मर जाने को जी चाहे है जी ये चाहे है कि पूछूँ कभी उन ज़ुल्फ़ों से क्या तुम्हारा भी सँवर जाने को जी चाहे है रसन-ओ-दार इधर काकुल-ओ-रुख़्सार उधर दिल बता तेरा किधर जाने को जी चाहे है

गुज़र जाएँगे जब दिन गुज़रे आलम याद आएँगे हमें तुम याद आओगे तुम्हें हम याद आएँगे

 

वीडियो 16

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

कलीम आजिज़

कलीम आजिज़

कलीम आजिज़

कलीम आजिज़

कलीम आजिज़

Mushaira ba-aizaaz kaleem ajiz

कलीम आजिज़

क्या ग़म है अगर शिकवा-ए-ग़म आम है प्यारे

कलीम आजिज़

किस नाज़ किस अंदाज़ से तुम हाए चलो हो

कलीम आजिज़

मत बुरा उस को कहो गरचे वो अच्छा भी नहीं

कलीम आजिज़

मिरा हाल पूछ के हम-नशीं मिरे सोज़-ए-दिल को हवा न दे

कलीम आजिज़

ये आँसू बे-सबब जारी नहीं है

कलीम आजिज़

ये दीवाने कभी पाबंदियों का ग़म नहीं लेंगे

कलीम आजिज़

यही बेकसी थी तमाम शब उसी बेकसी में सहर हुई

कलीम आजिज़

वो सितम न ढाए तो क्या करे उसे क्या ख़बर कि वफ़ा है क्या?

कलीम आजिज़

शाने का बहुत ख़ून-ए-जिगर जाए है प्यारे

कलीम आजिज़

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