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मज़हर इमाम

1928 - 2012 | दिल्ली, भारत

प्रमुखतम आधुकि शायरों में विख्यात/दूर दर्शन से संबंध

प्रमुखतम आधुकि शायरों में विख्यात/दूर दर्शन से संबंध

ग़ज़ल 56

नज़्म 5

 

शेर 26

दोस्तों से मुलाक़ात की शाम है

ये सज़ा काट कर अपने घर जाऊँगा

अब तो कुछ भी याद नहीं है

हम ने तुम को चाहा होगा

अक्सर ऐसा भी मोहब्बत में हुआ करता है

कि समझ-बूझ के खा जाता है धोका कोई

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रेखाचित्र 2

 

पुस्तकें 926

1975 Ki Behtareen Nazmen

 

1976

1977 Ka Sheri Adab

 

1978

Aab-e-Hayat

 

1995

Aab-e-Rawan

 

1978

Aadhunik Urdu Shairon Ki Behtareen Ghazlein

 

1979

Aagahi Ka Safar

 

2007

Aaghaz

 

1998

आहंग-ए-ग़ज़ल

Manzoom

2007

अाहंग-ए-नव

 

1996

Aal India Radio Aur Urdu

 

2008

चित्र शायरी 4

ज़िंदगी काविश-ए-बातिल है मिरा साथ न छोड़ तू ही इक उम्र का हासिल है मिरा साथ न छोड़ लोग मिलते हैं सर-ए-राह गुज़र जाते हैं तू ही इक हम-सफ़र-ए-दिल है मिरा साथ न छोड़ तू ने सोचा है मुझे तू ने सँवारा है मुझे तू मिरा ज़ेहन मिरा दिल है मिरा साथ न छोड़ तू न होगा तो कहाँ जा के जलूँगा शब भर तुझ से ही गर्मी-ए-महफ़िल है मिरा साथ न छोड़ मैं कि बिफरे हुए तूफ़ाँ में हूँ लहरों लहरों तू कि आसूदा-ए-साहिल है मिरा साथ न छोड़ इस रिफ़ाक़त को सिपर अपनी बना लें जी लें शहर का शहर ही क़ातिल है मिरा साथ न छोड़ एक मैं ने ही उगाए नहीं ख़्वाबों के गुलाब तू भी इस जुर्म में शामिल है मिरा साथ न छोड़ अब किसी राह पे जलते नहीं चाहत के चराग़ तू मिरी आख़िरी मंज़िल है मिरा साथ न छोड़

 

ऑडियो 8

ज़लज़ले सब दिल के अंदर हो गए

ज़िंदगी काविश-ए-बातिल है मिरा साथ न छोड़

टूटी हुई दीवार का साया तो नहीं हूँ

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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