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बेख़ुद देहलवी

1863 - 1955 | दिल्ली, भारत

दाग़ देहलवी के शिष्य

दाग़ देहलवी के शिष्य

ग़ज़ल 58

शेर 74

अदाएँ देखने बैठे हो क्या आईने में अपनी

दिया है जिस ने तुम जैसे को दिल उस का जिगर देखो

आइना देख कर वो ये समझे

मिल गया हुस्न-ए-बे-मिसाल हमें

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राह में बैठा हूँ मैं तुम संग-ए-रह समझो मुझे

आदमी बन जाऊँगा कुछ ठोकरें खाने के बाद

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ई-पुस्तक 17

असरार-ए-बे-ख़ुद

इंतिख़ाब-ए-कलाम मअ हयात व ख़िदमात

1980

दीवान-ए-गुफ़्तार-ए-बेख़ुद

 

 

Dur-e-Shahwaar-e-Bekhud

 

1930

गुफ़्तार-ए-बेख़ुद

 

1938

Guftar-e-Bekhud

 

1938

मिरातुल ग़ालिब

 

 

Miratul Ghalib

 

 

नंग-ओ-नामूस

 

1999

नया कलाम

दीवान-ए-गूफ़्तार-ए-बेख़ुद

 

चित्र शायरी 2

राह में बैठा हूँ मैं तुम संग-ए-रह समझो मुझे आदमी बन जाऊँगा कुछ ठोकरें खाने के बाद

दिल तो लेते हो मगर ये भी रहे याद तुम्हें जो हमारा न हुआ कब वो तुम्हारा होगा

 

ऑडियो 17

आप हैं बे-गुनाह क्या कहना

आशिक़ समझ रहे हैं मुझे दिल लगी से आप

आशिक़ हैं मगर इश्क़ नुमायाँ नहीं रखते

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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