अनस ख़ान

दोहा 55

मज़हब ने जो ठोंक दी हिली नहीं वो कील

क़ुदरत हर मख़्लूक़ को रोज़ करे तब्दील

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दुनिया एक सराब है पुख़्ता हुआ यक़ीन

मैं जितना चलता गया उतनी चली ज़मीन

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मस्जिद में पैदा हुआ सीखी वही ज़बान

तोता मंदिर पे चढ़ा देने लगा अज़ान

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उम्र से धोका खा गए परखा नहीं ज़मीर

बच्चा बच्चा ही रहा बढ़ता रहा शरीर

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मुल्ला पंडित सब यहाँ करते रहे फ़रेब

सोच रहा न्यूटन वहाँ गिरता क्यों है सेब

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI