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नसीम देहलवी

1799/ 1800 - 1866 | दिल्ली, भारत

नसीम देहलवी

ग़ज़ल 58

शेर 8

नाम मेरा सुनते ही शर्मा गए

तुम ने तो ख़ुद आप को रुस्वा किया

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आँखों में है लिहाज़ तबस्सुम-फ़िज़ा हैं लब

शुक्र-ए-ख़ुदा के आज तो कुछ राह पर हैं आप

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का'बा नहीं है ज़ाहिद-ए-ग़ाफ़िल निशान-ए-दोस्त

दिल ढूँड आशिक़ों का यही है मकान-ए-दोस्त

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रब्त-ए-बाहम के मज़े बाहम रहें तो ख़ूब हैं

याद रखना जान-ए-जाँ गर मैं नहीं तो तू नहीं

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कुफ़्र-ओ-दीं के क़ाएदे दोनों अदा हो जाएँगे

ज़ब्ह वो काफ़िर करे मुँह से कहें तकबीर हम

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पुस्तकें 5

 

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Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI