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नसीम देहलवी

1799/ 1800 - 1866 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 54

शेर 7

नाम मेरा सुनते ही शर्मा गए

तुम ने तो ख़ुद आप को रुस्वा किया

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आँखों में है लिहाज़ तबस्सुम-फ़िज़ा हैं लब

शुक्र-ए-ख़ुदा के आज तो कुछ राह पर हैं आप

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कुफ़्र-ओ-दीं के क़ाएदे दोनों अदा हो जाएँगे

ज़ब्ह वो काफ़िर करे मुँह से कहें तकबीर हम

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पुस्तकें 4

दफ़्तर-ए-शगरफ़

 

1869

Dafter-e-Shagarf

 

1869

Intekhab-e-Dawaween

Momin Dehlavi, Naseem Dehalvi, Tasleem Lucknowi

 

कुल्लियात-ए-नसीम

 

1966

 

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