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हसन नईम

1927 - 1991 | पटना, भारत

हसन नईम

ग़ज़ल 54

शेर 27

कुछ उसूलों का नशा था कुछ मुक़द्दस ख़्वाब थे

हर ज़माने में शहादत के यही अस्बाब थे

ग़म से बिखरा पाएमाल हुआ

मैं तो ग़म से ही बे-मिसाल हुआ

गर्द-ए-शोहरत को भी दामन से लिपटने दिया

कोई एहसान ज़माने का उठाया ही नहीं

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इतना रोया हूँ ग़म-ए-दोस्त ज़रा सा हँस कर

मुस्कुराते हुए लम्हात से जी डरता है

ख़ैर से दिल को तिरी याद से कुछ काम तो है

वस्ल की शब सही हिज्र का हंगाम तो है

पुस्तकें 6

Ashaar

 

1971

Ashaar

 

1971

Dabistan

 

1992

Ghazal Nama

 

1980

हसन नईम

 

2006

हसन नईम और नई ग़ज़ल

 

2002

 

ऑडियो 19

उम्मीद ओ यास ने क्या क्या न गुल खिलाए हैं

कुछ उसूलों का नशा था कुछ मुक़द्दस ख़्वाब थे

किसे बताऊँ कि वहशत का फ़ाएदा क्या है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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