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आलम ख़ुर्शीद

1959 | पटना, भारत

महत्वपूर्ण उत्तर-आधुनिक शायर।

महत्वपूर्ण उत्तर-आधुनिक शायर।

ग़ज़ल 48

शेर 24

इश्क़ में तहज़ीब के हैं और ही कुछ फ़लसफ़े

तुझ से हो कर हम ख़फ़ा ख़ुद से ख़फ़ा रहने लगे

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बहुत सुकून से रहते थे हम अँधेरे में

फ़साद पैदा हुआ रौशनी के आने से

मैं ने बचपन में अधूरा ख़्वाब देखा था कोई

आज तक मसरूफ़ हूँ उस ख़्वाब की तकमील में

हाथ पकड़ ले अब भी तेरा हो सकता हूँ मैं

भीड़ बहुत है इस मेले में खो सकता हूँ मैं

कुछ रस्ते मुश्किल ही अच्छे लगते हैं

कुछ रस्तों को हम आसान नहीं करते

पुस्तकें 8

कार-ए-ज़ियाँ

 

2008

Khayalabad

 

2003

Naye Mausam Ki Talash

 

1988

Parvez Shahidi

 

2006

Zahr-e-Gul

 

1998

 

वीडियो 4

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
याद करते हो मुझे सूरज निकल जाने के बा'द

आलम ख़ुर्शीद

हमेशा दिल में रहता है कभी गोया नहीं जाता

आलम ख़ुर्शीद

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