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इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन

1727 - 1755 | दिल्ली, भारत

मीर तक़ी ' मीर ' के समकालीन और उनके प्रतिद्वंदी के तौर पर प्रसिद्ध। उन्हे उनके पिता ने क़त्ल किया।

मीर तक़ी ' मीर ' के समकालीन और उनके प्रतिद्वंदी के तौर पर प्रसिद्ध। उन्हे उनके पिता ने क़त्ल किया।

ग़ज़ल 31

शेर 13

क्या बदन होगा कि जिस के खोलते जामे का बंद

बर्ग-ए-गुल की तरह हर नाख़ुन मोअत्तर हो गया

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हक़ मुझे बातिल-आश्ना करे

मैं बुतों से फिरूँ ख़ुदा करे

lord by falsehood may I not be led astray

may I from these idols, never turn away

ख़ल्वत हो और शराब हो माशूक़ सामने

ज़ाहिद तुझे क़सम है जो तू हो तो क्या करे

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पुस्तकें 6

Deewan-e-Yaqeen

 

 

Deewan-e-Yaqeen

 

1930

दीवान-ए-यक़ीन देहलवी

 

1995

Inamullah Khan Yaqeen : Ahd Aur Shairi

 

2007

Intikhab-e-Deewan

 

 

Intikhab-e-Kalam-e-Inamullah Khan Yaqeen

 

1991

 

ऑडियो 7

इस क़दर ग़र्क़ लहू में ये दिल-ए-ज़ार न था

बहार आई है क्या क्या चाक जैब-ए-पैरहन करते

मिस्र में हुस्न की वो गर्मी-ए-बाज़ार कहाँ

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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