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सादिक़ नसीम

1924 | पाकिस्तान

ग़ज़ल 16

शेर 3

तुम्हारा नाम किसी अजनबी के लब पर था

ज़रा सी बात थी दिल को मगर लगी है बहुत

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जब भी तिरी क़ुर्बत के कुछ इम्काँ नज़र आए

हम ख़ुश हुए इतने की परेशाँ नज़र आए

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ज़िंदा रहने के थे जितने उस्लूब

ज़िंदगी कट गई तब याद आए

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पुस्तकें 1

Reg-e-Rawan

 

1979

 

चित्र शायरी 3

जब भी तिरी क़ुर्बत के कुछ इम्काँ नज़र आए हम ख़ुश हुए इतने की परेशाँ नज़र आए

तुम्हारा नाम किसी अजनबी के लब पर था ज़रा सी बात थी दिल को मगर लगी है बहुत

तुम्हारा नाम किसी अजनबी के लब पर था ज़रा सी बात थी दिल को मगर लगी है बहुत