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सलीम सिद्दीक़ी

1976

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अपने जीने के हम अस्बाब दिखाते हैं तुम्हें

दोस्तो आओ कि कुछ ख़्वाब दिखाते हैं तुम्हें

अब ज़मीनों को बिछाए कि फ़लक को ओढ़े

मुफ़्लिसी तो भरी बरसात में बे-घर हुई है

कौन सा जुर्म ख़ुदा जाने हुआ है साबित

मशवरे करता है मुंसिफ़ जो गुनहगार के साथ

उम्र भर जिस के लिए पेट से बाँधे पत्थर

अब वो गिन गिन के खिलाता है निवाले मुझ को

आज रक्खे हैं क़दम उस ने मिरी चौखट पर

आज दहलीज़ मिरी छत के बराबर हुई है

आज फिर अपनी समाअत सौंप दी उस ने हमें

आज फिर लहजा हमारा इख़्तियार उस ने किया

इक एक हर्फ़ की रखनी है आबरू मुझ को

सवाल दिल का नहीं है मिरी ज़बान का है

हूँ पारसा तिरे पहलू में शब गुज़ार के भी

मैं बे-लिबास नहीं पैरहन उतार के भी

बेड़ियाँ डाल के परछाईं की पैरों में मिरे

क़ैद रखते हैं अँधेरों में उजाले मुझ को

ज़ख़्म-दर-ज़ख़्म सुख़न और भी होता है वसीअ

अश्क-दर-अश्क उभरती है क़लमकार की गूँज

हम आदमी की तरह जी रहे हैं सदियों से

चलो 'सलीम' अब इंसान हो के देखते हैं

ख़रीदने के लिए उस को बिक गया ख़ुद ही

मैं वो हूँ जिस को मुनाफ़े में भी ख़सारा हुआ

ख़ौफ़ आँखों में मिरी देख के चिंगारी का

कर दिया रात ने सूरज के हवाले मुझ को

कज-कुलाही पे मग़रूर हुआ कर इतना

सर उतर आते हैं शाहों के भी दस्तार के साथ

इक धुँदलका हूँ ज़रा देर में छट जाऊँगा

मैं कोई रात नहीं हूँ जो सहर तक जाऊँ