Sayad Mohammad Abdul Ghafoor Shahbaz's Photo'

सययद मोहम्म्द अब्दुल ग़फ़ूर शहबाज़

1859 - 1908 | कोलकाता, भारत

अनुवादक,शायर,कुल्लियात-ए-नज़ीर के संपादक और शोधकर्ता

अनुवादक,शायर,कुल्लियात-ए-नज़ीर के संपादक और शोधकर्ता

ख़ुदा ने मुँह में ज़बान दी है तो शुक्र ये है कि मुँह से बोलो

कि कुछ दिनों में मुँह रहेगा मुँह में चलती ज़बाँ रहेगी

'शहबाज़' में ऐब ही नहीं कुल

एक आध कोई हुनर भी होगा

दिल तो दिल अफ़ई-ए-गेसू वो बला है काफ़िर

इस का काटा कोई अफ़ई भी पानी माँगे

शब-ए-फ़िराक़ का छाया हुआ है रोब ऐसा

बुला बुला के थके हम क़ज़ा नहीं आई

हम रो रो अश्क बहाते हैं वो तूफ़ाँ बैठे उठाते हैं

यूँ हँस हँस कर फ़रमाते हैं क्यूँ मर्द का नाम डुबोता है

मिट्टी का ही घर होगा बर्बाद

मिट्टी तिरे तन का घर भी होगा

अंजाम ख़ुशी का दुनिया में सच कहते हो ग़म होता है

साबित है गुल और शबनम से जो हँसता है वो रोता है