सय्यदा जाफ़र का परिचय
पहचान: भारत की प्रसिद्ध महिला शोधकर्ता, दकनी साहित्य की विशेषज्ञ, आलोचक और भाषाविज्ञानी
सैयदा जाफर का जन्म 1934 में हैदराबाद के ज़िले करीमनगर के एक विद्वान परिवार में हुआ। उनके पुरखे सैयद रज़ी थे, जिन्होंने "नहजुल बलाग़ा" का संकलन किया, जबकि प्रसिद्ध कवि सैयद मुहम्मद वाला मौसवी भी उनके पूर्वजों में शामिल थे।
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मदरसा नामपल्ली गर्ल्स स्कूल से प्राप्त की, जहाँ से उनके शैक्षिक जीवन की विधिवत शुरुआत हुई। हैदराबाद की गंगा-जमुनी तहज़ीब और उस्मानिया विश्वविद्यालय का शैक्षिक वातावरण उनके बौद्धिक विकास में अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हुआ।
उन्होंने 1959 में उस्मानिया विश्वविद्यालय से "उर्दू निबंध का विकास" विषय पर पीएचडी की डिग्री प्राप्त की, जो उस समय किसी महिला द्वारा इस प्रकार का पहला शोध कार्य था।
उनका शिक्षण जीवन उस्मानिया विश्वविद्यालय से शुरू हुआ, जहाँ वे रीडर, प्रोफेसर और बाद में उर्दू विभाग की अध्यक्ष रहीं। फरवरी 1991 में वे हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में स्थानांतरित हुईं और वहीं से प्रोफेसर के रूप में सेवानिवृत्त हुईं।
डॉ. सैयदा जाफर का मुख्य क्षेत्र दकनी साहित्य था, जिसमें उन्होंने डॉ. मुहीउद्दीन क़ादरी ज़ोर की परंपरा को आगे बढ़ाया। दकनी अध्ययन में उन्होंने शाह तुराब चिश्ती की मस्नवी "मन समझावन" पर कार्य करते हुए उसे मराठी प्रभावों से जोड़ा। "कुल्लियात मुहम्मद क़ुली क़ुतुब शाह" के संपादन में उन्होंने लंदन से प्राप्त बारह नई ग़ज़लों को शामिल किया। उनकी अन्य महत्वपूर्ण कृतियों में "दकनी रुबाइयाँ", "सुख अंजन", "दकनी गद्य का चयन", "मस्नवी यूसुफ ज़ुलेखा", "चंदर बदन व महियार", "मस्नवी माह पैकर", "जन्नत सिंगार", "दकनी साहित्य में क़सीदे की परंपरा", "मस्नवी गुलदस्ता" और "नौसरहार" शामिल हैं। उनकी संकलित "दकनी शब्दकोश" लगभग साढ़े तेरह हज़ार प्रविष्टियों पर आधारित एक महत्वपूर्ण कृति है, जिसमें शब्दों के स्रोत और प्रयोग का भी उल्लेख किया गया है।
साहित्य के इतिहास के क्षेत्र में उन्होंने डॉ. ज्ञानचंद जैन के साथ मिलकर पाँच खंडों में "उर्दू साहित्य का इतिहास (1700 तक)" लिखा। इसके अतिरिक्त "उर्दू साहित्य का इतिहास (मीर के युग से प्रगतिशील आंदोलन तक)" की चार खंडों वाली कृति उनकी विद्वता का प्रमाण है।
इसके अलावा "मास्टर रामचंद्र और उर्दू गद्य", "महक और महक", "फन की जांच" जैसी पुस्तकों के साथ उन्होंने साहित्य अकादमी के लिए डॉ. ज़ोर, मखदूम और फ़िराक़ पर मोनोग्राफ भी लिखे।
उनकी लेखन शैली संतुलित, गहन और विद्वत्तापूर्ण थी। प्रोफेसर इहतिशाम हुसैन के अनुसार उनकी क्षमताएँ शोध और आलोचना दोनों क्षेत्रों में समान रूप से सशक्त थीं। उन्होंने प्राचीन दकनी साहित्य के साथ-साथ आधुनिक साहित्य पर भी गहरी पकड़ बनाई।
निधन: 24 जून 2016 को हैदराबाद में उनका निधन हुआ।
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