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शाहिद लतीफ़

मुंबई, भारत

रात ही के दामन में चाँद भी हैं तारे भी

रात ही की क़िस्मत है बे-चराग़ होना भी

कोई लहजा कोई जुमला कोई चेहरा निकल आया

पुराने ताक़ के सामान से क्या क्या निकल आया

शरीफ़ लोग कहाँ जाएँ क्या करें आख़िर

ज़मीं चीख़ती फिरती है आसमाँ चुप-चाप