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शरफ़ मुजद्दिदी

ग़ज़ल 18

शेर 22

दिल में मिरे जिगर में मिरे आँख में मिरी

हर जा है दोस्त और नहीं मिलती है जा-ए-दोस्त

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अल्लाह अल्लाह ख़ुसूसिय्यत-ए-ज़ात-ए-हसनैन

सारी उम्मत के हैं पोतों से नवासे बढ़ कर

तेरी आँखें जिसे चाहें उसे अपना कर लें

काश ऐसा ही सिखा दें कोई अफ़्सूँ मुझ को

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इस पर्दे में ये हुस्न का आलम है इलाही

बे-पर्दा वो हो जाएँ तो क्या जानिए क्या हो

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हज़रत-ए-नासेह भी मय पीने लगे

अब मुझे समझाने वाला कौन था

पुस्तकें 1

दीवान-ए-शरफ़ मुजद्दिदी

 

1937