Sheri Bhopali's Photo'

शेरी भोपाली

1914 - 1991 | भोपाल, भारत

शेरी भोपाली

ग़ज़ल 6

शेर 8

बराबर ख़फ़ा हों बराबर मनाएँ

तुम बाज़ आओ हम बाज़ आएँ

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मोहब्बत मअ'नी अल्फ़ाज़ में लाई नहीं जाती

ये वो नाज़ुक हक़ीक़त है जो समझाई नहीं जाती

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ये बाज़ी मोहब्बत की बाज़ी है नादाँ

इसे जीतना है तो हारे चला जा

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सुनने में रहे हैं मसर्रत के वाक़िआत

जम्हूरियत का हुस्न नुमायाँ है आज-कल

क़यामत है ये कह कर उस ने लौटाया है क़ासिद को

कि उन का तो हर इक ख़त आख़िरी पैग़ाम होता है

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पुस्तकें 2

Atish-e-Dil

 

1984

Subh-e-Ghazal

 

1964

 

चित्र शायरी 1

बराबर ख़फ़ा हों बराबर मनाएँ न तुम बाज़ आओ न हम बाज़ आएँ

 

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