शोज़ेब काशिर के शेर
ज़रा सा शोर-ए-बग़ावत उठा और उस के बा'द
वज़ीर तख़्त पे बैठे थे और जेल में हम
-
टैग : ज़िंदाँ
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
- सुझाव
- प्रतिक्रिया
- डाउनलोड