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सुलतान फ़ारूक़ी

1932 | लंदन, यूनाइटेड किंगडम

ग़ज़ल 2

 

शेर 1

माना कि हम वतन से अज़ीज़ों से दूर हैं

तहज़ीब से जुदा हैं उर्दू ज़बाँ से दूर

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