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सय्यद ज़ामिन अब्बास काज़मी

1989 | साहिवाल, पाकिस्तान

ग़ज़ल 12

शेर 11

हिज्र होगा कोई हिज्र का नौहा होगा

बाज़ आते हैं मोहब्बत से जो होगा होगा

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जैसे मैं दोस्तों से हँस के गले मिलता हूँ

कोई मामूली अदाकार नहीं कर सकता

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पहले भी जिस पे मिरे सब्र की हद ख़त्म हुई

तू ने कर दी ना वही बात दोबारा मिरे दोस्त

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तुम्हारी बात से इतना भी दुख नहीं पहुँचा

मगर जो पहुँचा तुम्हारी वज़ाहतों से मुझे

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एक दो बार तो रोकूँगा मुरव्वत में तुझे

सैकड़ों बार तो इसरार नहीं कर सकता

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