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तालिब बाग़पती

1903 - 1984

तालिब बाग़पती

ग़ज़ल 27

शेर 2

वो मेरे बा'द रोते हैं अब उन से कोई क्या पूछे

कि पहले किस लिए नाराज़ थे अब मेहरबाँ क्यूँ हो

यूँ भी तिरा एहसान है आने के लिए

दोस्त किसी रोज़ जाने के लिए

 

पुस्तकें 3

Sakh-e-Nabat

 

1935

शाख़-ए-नबात

 

1985

Shakh-e-Nabat

 

1936

 

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  • फ़िराक़ गोरखपुरी फ़िराक़ गोरखपुरी समकालीन