ख़ालिक़-ए-कायनात ने हव्वा की बेटी की तख़लीक़ ग़ुस्सा उतारने के लिए नहीं की थी बल्कि ख़ुलूस बाँटने के लिए की थी, नस्ल-ए-इंसानी की बक़ा के लिए की थी, मोहब्बत भरी रफ़ाक़त के लिए की थी।
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मेरे ख़याल से दुनिया का नज़्म-ओ-नस्क़ या तो औरत को सौंप दिया जाना चाहिए या फिर औरत के मशवरों के बगैर किसी क़िस्म की कोई सियासत न की जाए।
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