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वहशत रज़ा अली कलकत्वी

1881 - 1956 | कोलकाता, भारत

बंगाल के प्रमुख उत्तर – क्लासिकी शायर

बंगाल के प्रमुख उत्तर – क्लासिकी शायर

ग़ज़ल

ऐ अहल-ए-वफ़ा ख़ाक बने काम तुम्हारा

नोमान शौक़

कहते हो अब मिरे मज़लूम पे बेदाद न हो

नोमान शौक़

चला जाता है कारवान-ए-नफ़स

नोमान शौक़

तीर-ए-नज़र ने ज़ुल्म को एहसाँ बना दिया

नोमान शौक़

देखना वो गिर्या-ए-हसरत-मआल आ ही गया

नोमान शौक़

दर्द आ के बढ़ा दो दिल का तुम ये काम तुम्हें क्या मुश्किल है

नोमान शौक़

दिल के कहने पे चलूँ अक़्ल का कहना न करूँ

नोमान शौक़

नहीं कि इश्क़ नहीं है गुल ओ समन से मुझे

नोमान शौक़

नहीं मुमकिन लब-ए-आशिक़ से हर्फ़-ए-मुद्दआ निकले

नोमान शौक़

पोशीदा देखती है किसी की नज़र मुझे

नोमान शौक़

यहाँ हर आने वाला बन के इबरत का निशाँ आया

नोमान शौक़

वफ़ा-ए-दोस्ताँ कैसी जफ़ा-ए-दुश्मनाँ कैसी

नोमान शौक़

शर्मिंदा किया जौहर-ए-बालिग़-नज़री ने

नोमान शौक़

शौक़ फिर कूचा-ए-जानाँ का सताता है मुझे

नोमान शौक़

संग-ए-तिफ़्लाँ फ़िदा-ए-सर न हुआ

नोमान शौक़

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI