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वासिफ़ देहलवी

1910 - 1987 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल

किसी के इश्क़ का ये मुस्तक़िल आज़ार क्या कहना

नोमान शौक़

खुलने ही लगे उन पर असरार-ए-शबाब आख़िर

नोमान शौक़

ज़र्रा हरीफ़-ए-मेहर दरख़्शाँ है आज कल

नोमान शौक़

नसीम-ए-सुब्ह यूँ ले कर तिरा पैग़ाम आती है

नोमान शौक़

बुझते हुए चराग़ फ़रोज़ाँ करेंगे हम

नोमान शौक़

वो जल्वा तूर पर जो दिखाया न जा सका

नोमान शौक़

वो जिन की लौ से हज़ारों चराग़ जलते थे

नोमान शौक़

हम-सफ़र थम तो सही दिल को सँभालूँ तो चलूँ

नोमान शौक़

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI