noImage

वासिफ़ देहलवी

1910 - 1987 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 18

शेर 21

बुझते हुए चराग़ फ़रोज़ाँ करेंगे हम

तुम आओगे तो जश्न-ए-चराग़ाँ करेंगे हम

दीदार से पहले ही क्या हाल हुआ दिल का

क्या होगा जो उल्टेंगे वो रुख़ से नक़ाब आख़िर

हल्की सी ख़लिश दिल में निगाहों में उदासी

शायद यूँही होती है मोहब्बत की शुरूआत

आज रुख़्सत हो गया दुनिया से इक बीमार-ए-ग़म

दर्द ऐसा दिल में उट्ठा जान ले कर ही गया

  • शेयर कीजिए

दामन के दाग़ अश्क-ए-नदामत ने धो दिए

लेकिन ये दिल का दाग़ मिटाया जा सका

पुस्तकें 1

ज़र-ए-गुल

 

1976

 

ऑडियो 8

किसी के इश्क़ का ये मुस्तक़िल आज़ार क्या कहना

खुलने ही लगे उन पर असरार-ए-शबाब आख़िर

ज़र्रा हरीफ़-ए-मेहर दरख़्शाँ है आज कल

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

"दिल्ली" के और शायर

  • शैख़  ज़हूरूद्दीन हातिम शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
  • दाग़ देहलवी दाग़ देहलवी
  • शाह नसीर शाह नसीर
  • हसरत मोहानी हसरत मोहानी
  • आबरू शाह मुबारक आबरू शाह मुबारक
  • बेख़ुद देहलवी बेख़ुद देहलवी
  • राजेन्द्र मनचंदा बानी राजेन्द्र मनचंदा बानी
  • अनीसुर्रहमान अनीसुर्रहमान
  • बहादुर शाह ज़फ़र बहादुर शाह ज़फ़र
  • शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ शेख़ इब्राहीम ज़ौक़