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वासिफ़ देहलवी

1910 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 18

शेर 21

बुझते हुए चराग़ फ़रोज़ाँ करेंगे हम

तुम आओगे तो जश्न-ए-चराग़ाँ करेंगे हम

दीदार से पहले ही क्या हाल हुआ दिल का

क्या होगा जो उल्टेंगे वो रुख़ से नक़ाब आख़िर

आज रुख़्सत हो गया दुनिया से इक बीमार-ए-ग़म

दर्द ऐसा दिल में उट्ठा जान ले कर ही गया

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ई-पुस्तक 1

ज़र-ए-गुल

 

1976

 

ऑडियो 8

किसी के इश्क़ का ये मुस्तक़िल आज़ार क्या कहना

खुलने ही लगे उन पर असरार-ए-शबाब आख़िर

ज़र्रा हरीफ़-ए-मेहर दरख़्शाँ है आज कल

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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