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यशपाल गुप्ता

1928 | लंदन, यूनाइटेड किंगडम

ग़ज़ल 2

 

शेर 2

जो सुख के उजाले में था परछाईं हमारी

अब दुख के अँधेरे में वो साया नहीं देखा

ये समझ कर फ़क़ीरी ही में है ख़ुदा

गुन हमेशा फ़क़ीरों के गाते रहे

 

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