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ज़हीर अहमद ज़हीर

1941

ज़हीर अहमद ज़हीर

ग़ज़ल 4

 

शेर 3

सैंकड़ों दिलकश बहारें थीं हमारी मुंतज़िर

हम तिरी ख़्वाहिश में लेकिन ठोकरें खाते रहे

आँसू फ़लक की आँख से टपके तमाम रात

और सुब्ह तक ज़मीन का आँचल भिगो गए

वो चाँदनी वो तबस्सुम वो प्यार की बातें

हुई सहर तो वो मंज़र तमाम शब के गए