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ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

1933 | लंदन, यूनाइटेड किंगडम

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

ग़ज़ल 1

 

शेर 18

दीवाना-ए-जुस्तुजू हो गया चाँद

बादल से गिर के खो गया चाँद

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अक़्ल कुछ ज़ीस्त की कफ़ील नहीं

ज़िंदगी इतनी बे-सबील नहीं

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मुख़्तसर बात-चीत अच्छी है

लेकिन इतना भी इख़्तिसार कर

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आप के साथ मुस्कुराने में

ज़िंदगी एक फूल होती है

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आरिज़ से तिरे सुब्ह की तोहमत उठेगी

ज़ुल्फ़ों पे तिरी शाम का इल्ज़ाम रहेगा

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Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI