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ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

लंदन, यूनाइटेड किंगडम

ग़ज़ल 1

 

शेर 18

दीवाना-ए-जुस्तुजू हो गया चाँद

बादल से गिर के खो गया चाँद

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मुख़्तसर बात-चीत अच्छी है

लेकिन इतना भी इख़्तिसार कर

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आप के साथ मुस्कुराने में

ज़िंदगी एक फूल होती है

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आरिज़ से तिरे सुब्ह की तोहमत उठेगी

ज़ुल्फ़ों पे तिरी शाम का इल्ज़ाम रहेगा

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फ़िक्र-मंदी फ़ुज़ूल होती है

कोशिश-ए-दिल क़ुबूल होती है

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