ज़ोए अंसारी का परिचय
उपनाम : 'ज़ोए अंसारी'
मूल नाम : ज़िल्ले हसनैन नक़वी
जन्म : 06 Feb 1925 | सहारनपुर, उत्तर प्रदेश
निधन : 31 Jan 1991 | मुंबई, महाराष्ट्र
पहचान: प्रसिद्ध अनुवादक, पत्रकार, शब्दकोशकार और रूसी साहित्य के महत्वपूर्ण व्याख्याकार
ज़ोए अंसारी, जिनका वास्तविक नाम ज़िल्ले हसनैन नक़वी था, 6 फ़रवरी 1925 को सहारनपुर, उत्तर प्रदेश में पैदा हुए। उनका संबंध एक धार्मिक और विद्वतापूर्ण परिवार से था, जहाँ दीनियत को विशेष महत्व दिया जाता था। प्रारंभिक शिक्षा घर पर प्राप्त करने के बाद वे मस्बिया कॉलेज, मेरठ में दाख़िल हुए, जहाँ उन्होंने अरबी और फ़ारसी भाषाएँ सीखीं। उर्दू साहित्य से उन्हें शुरू से ही गहरी दिलचस्पी थी, लेकिन वे अपनी इस शिक्षा को अपर्याप्त मानते थे। इसी कारण बाद में उन्होंने अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य की ओर ध्यान दिया और लगातार अध्ययन के माध्यम से अंग्रेज़ी पर असाधारण पकड़ हासिल की। मास्को में प्रवास के दौरान उन्होंने रूसी भाषा सीखी और वहीं से डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की।
शैक्षिक और आर्थिक परिस्थितियों के कारण उन्हें कम उम्र में ही व्यावहारिक जीवन में उतरना पड़ा और उन्होंने पत्रकारिता को अपना पेशा बनाया। दिल्ली आने के बाद वे दैनिक “अंसारी नामा” से जुड़े। उसी दौर में प्रगतिशील आंदोलन और मार्क्सवाद का प्रभाव बहुत तेज़ था। वे कम्युनिस्ट पार्टी के साप्ताहिक अख़बार “क़ौमी जंग” के संपादकीय मंडल में शामिल हुए, जिसके संपादक सैयद सब्त हसन थे। 1946 में सब्त हसन के अमेरिका जाने के बाद ज़ेड अंसारी संपादकीय मंडल का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए। स्वतंत्रता आंदोलन, प्रगतिशील साहित्य और राजनीतिक हलचलों के उस दौर में उन्हें भी गिरफ़्तार किया गया, लेकिन बाद में सरकार से समझौते के बाद वे रिहा हुए, जिस पर उनकी पार्टी ने असंतोष व्यक्त किया। इसके बाद उन्होंने स्वयं को पूरी तरह पत्रकारिता और साहित्य के लिए समर्पित कर दिया।
ज़ोए अंसारी दैनिक “इंक़लाब” बंबई से भी जुड़े रहे और मीराजी, अख़्तरुल ईमान तथा मधुसूदन के साथ मिलकर “ख़याल” नामक साहित्यिक पत्रिका निकाली। वे हास्य स्तंभ लेखन में भी दक्ष थे और उनके कॉलम काफ़ी लोकप्रिय रहे। बाद में वे “शाहराह” और फिर यूसुफ़ देहलवी के साप्ताहिक पत्र “आईना” की संपादकीय ज़िम्मेदारियों से जुड़े।
ज़ोए अंसारी की विद्वत्तापूर्ण जीवन यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय मास्को में बीता, जहाँ उन्हें दारुल-तरजुमा में काम करने का अवसर मिला। उन्होंने रूसी भाषा में ऐसी दक्षता प्राप्त की कि रूसी साहित्य के महान रचनाकारों को उर्दू जगत से परिचित कराने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने दोस्तोयेव्स्की, चेख़व और पुश्किन जैसे महान रूसी लेखकों की कृतियों का अनुवाद किया, आधुनिक रूसी कविता को उर्दू के काव्यात्मक रूप में ढाला और उर्दू-रूसी शब्दकोश भी तैयार किया। कार्ल मार्क्स और एंगेल्स की चयनित रचनाओं के उर्दू अनुवाद भी उनकी महत्वपूर्ण सेवाओं में शामिल हैं। मास्को में उनकी विद्वत्तापूर्ण सेवाओं के सम्मान में उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई।
ज़ोए अंसारी ने उर्दू साहित्य और शास्त्रीय काव्य परंपरा पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने ग़ालिब की फ़ारसी मसनवियों का उर्दू में पद्य अनुवाद किया, अमीर ख़ुसरो की मसनवियों का संपादन किया और ग़ालिब व ख़ुसरो पर रूसी भाषा में संकलन तैयार किए। उनकी प्रमुख पुस्तकों में “मसनवी का सफ़रनामा”, “काँटों की ज़बान”, “कही अनकही”, “किताब शनासी”, “इक़बाल की तलाश”, “ग़ालिब शनासी”, “कम्युनिज़्म और मज़हब”, “वरक़ वरक़” और “ज़बान व बयान” शामिल हैं।
निधन: ज़ोए अंसारी का निधन 31 जनवरी 1991 को बंबई में हुआ।
सहायक लिंक : | https://ur.wikipedia.org/wiki/%D8%B8_%D8%A7%D9%86%D8%B5%D8%A7%D8%B1%DB%8C