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Zulekha Husain's Photo'

ज़ुलेख़ा हुसैन

1930 - 2014 | कोचीन, भारत

केरल में उर्दू उपन्यास-लेखन की बुनियाद रखने वाली प्रसिद्ध उपन्यासकार

केरल में उर्दू उपन्यास-लेखन की बुनियाद रखने वाली प्रसिद्ध उपन्यासकार

ज़ुलेख़ा हुसैन का परिचय

उपनाम : 'हुसैन'

मूल नाम : ज़ुलेख़ा

जन्म :कोचीन, केरला

निधन : 15 Jul 2014 | कोचीन, केरला

पहचान: केरल में उर्दू उपन्यास-लेखन की बुनियाद रखने वाली प्रसिद्ध उपन्यासकार और गुमनाम अदबी शख्सियत

ज़ुलेखा हुसैन का जन्म 1930 में केरल के ऐतिहासिक तटीय शहर कोचीन में हुआ। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा कोचीन के ‘आसिया बाई मदरसे’ में प्राप्त की, जहाँ मलयालम और अरबी के साथ-साथ उर्दू भी पढ़ाई जाती थी। उन दिनों हैदराबाद से शिक्षक केरल पढ़ाने आया करते थे। ज़ुलेखा हुसैन ने ऐसे ही एक शिक्षक मौलवी रिज़वानुल्लाह से उर्दू भाषा और साहित्य में विशेष दक्षता प्राप्त की।

वह एक ऐसे पारंपरिक समाज में पली-बढ़ीं जहाँ लड़कियों का घर से बाहर निकलकर शिक्षा प्राप्त करना अनुचित समझा जाता था। उन्होंने घर में रहकर प्रेमचंद, गुलशन नंदा और महेंद्र नाथ जैसे बड़े उपन्यासकारों का गहरा अध्ययन किया और पुस्तकों के प्रति गहरी रुचि विकसित की।

सिर्फ़ पंद्रह वर्ष की आयु में उनकी शादी जनाब हुसैन से कर दी गई। उनके पति ने प्रगतिशील सोच का परिचय देते हुए उन्हें पढ़ने-लिखने की पूरी स्वतंत्रता दी।

उनकी प्रारंभिक कहानियाँ और अफ़साने दिल्ली की प्रसिद्ध उर्दू पत्रिकाओं ‘शमा’ और ‘खातून-ए-मशरिक़’ में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे।

पति के प्रोत्साहन से उन्होंने बीस वर्ष की आयु में अपना पहला उपन्यास “मेरे सनम” लिखा, जिसे 1950 में दिल्ली के चमन बुक डिपो ने प्रकाशित किया। यह देश-विभाजन के बाद का अत्यंत संवेदनशील दौर था, इसलिए वे कई वर्षों तक अपने उपन्यासों पर अपना नाम, पता या तस्वीर देने से बचती रहीं और गुमनामी में लिखती रहीं।

ज़ुलेखा हुसैन ने केरल जैसे गैर-उर्दू भाषी क्षेत्र में रहते हुए, जहाँ किसी की मातृभाषा उर्दू नहीं थी, 28 उपन्यास, 8 नॉवलेट और अनेक कहानियाँ लिखीं।

उर्दू माहौल से दूर होने के बावजूद उनके उपन्यासों में दिल्ली और लखनऊ की तहज़ीब, सामाजिक जीवन और मुहावरों की सुंदर झलक मिलती है, जो उनके व्यापक अध्ययन का प्रमाण है।

उनका उपन्यास “नसीब नसीब की बात” उनके अन्य उपन्यासों से बिल्कुल अलग है, जो केरल के स्थानीय परिवेश (कोल्लम, आलप्पी और एर्नाकुलम) पर आधारित है और जिसमें स्थानीय जीवन का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण मिलता है।

ज़ुलेखा हुसैन का जीवन गहरे व्यक्तिगत दुखों और त्रासदियों से भरा रहा, जिनका प्रभाव उनकी रचनाओं पर भी दिखाई देता है।

लगातार दुखों और एकांतप्रिय जीवन के कारण वे उर्दू दुनिया से दूर रहीं और लंबे समय तक पाठकों को यह भी पता नहीं चल सका कि इतने सुंदर उपन्यास लिखने वाली लेखिका कहाँ रहती हैं।

जब उनका उपन्यास “तारीकियों के बाद” प्रकाशित हुआ, तब केरल के तत्कालीन शिक्षा मंत्री सी. एच. मोहम्मद कोया ने उसका मलयालम अनुवाद करवाकर प्रसिद्ध साप्ताहिक ‘चंद्रिका’ में धारावाहिक रूप में प्रकाशित करवाया, जो उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

जीवन के अंतिम दिनों में भारत सरकार ने उन्हें ‘उर्दू भाषा फ़ेलोशिप कमेटी’ में शामिल किया। ‘केरल उर्दू टीचर्स एसोसिएशन’ ने भी उनके सम्मान में एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया।

उनके प्रमुख उपन्यासों में “मेरे सनम”, “आपा”, “सबा”, “ओ भूलने वाले”, “पत्थर की लकीर”, “रूह के बंधन”, “अपने और पराये”, “तारीकियों के बाद”, “नसीब नसीब की बात”, “राह अकेली”, “हसरत-ए-साहिल” और “एक फूल हज़ार ग़म” शामिल हैं।

निधन: ज़ुलेखा हुसैन का निधन 15 जुलाई 2014 को कोचीन में हुआ।

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