ये किताब अमीर इमाम की कविताओं का तीसरा मज्मूआ है। इनकी शायरी में ज़िन्दगी के नए पहलुओं और ज़ावियों की तरफ़ इशारा मिलता है। अशआर में अनोखे विषयों को क़लमबन्द करने और नई बात कहने के हुनर से वो बख़ूबी वाक़िफ़ हैं। उपमाओं और रूपकों का बरमहल इस्तेमाल भी उनके सृजनात्मक व्यक्तिवादी ज़ेहन का दर्पण है।