ख़िलाफ़ कहती हैं हूरें कि है क़मर का सा

मोहसिन ख़ान मोहसिन

ख़िलाफ़ कहती हैं हूरें कि है क़मर का सा

मोहसिन ख़ान मोहसिन

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    ख़िलाफ़ कहती हैं हूरें कि है क़मर का सा

    हमें नज़र नहीं आता है उस बशर का सा

    नज़र तो आता है मिटता वो नक़्शा शर का सा

    दुआ में देता है मालूम कुछ असर का सा

    घरौंदे यूँ तो बहुत देख डाले बेगम ने

    मज़ा मिला मगर शैख़-जी के घर का सा

    हुए कसबी को दिल दे के आख़िरश हैरान

    मैं पहले समझी थी सौदा है ये ज़रर का सा

    नहीं वो पान से करते हैं सुर्ख़ सूत का मुँह

    लगाते हैं दिल-ए-बिस्मिल में एक चरका सा

    उठाई रुख़ से दिलाई जो दूल्हा ने बाजी

    ज़िया-ए-हुस्न से जल्वा हुआ क़मर का सा

    तुम्हारे दिल सा खो जाए कोई आलम में

    कोई गुम हो जहाँ में मिरी कमर का सा

    ये ख़त नवाब को पहुँचा दो मामा मैं वारी

    बना लो रूप बुआ आज नामा-बर का सा

    हज़ार चाहती हूँ बोलूँ उन से हो के निडर

    यही तो डर है कि लगता है मुझ को धड़का सा

    वो डाँटा शैख़ को बेगम की चश्म-ए-पुर-ख़ूँ ने

    हुआ ज़रा में वो मालूम वाँ से सरका सा

    निगोड़ी वस्ल की शब भी हुआ चैन नसीब

    लगा रहा बुआ खटका मूई सहर का सा

    सुख़न की परियों को ले कर सरिर-ए-मज़मूँ पर

    हवा में उड़ता है 'मोहसिन' लगा के पर का सा

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