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ग़ज़ल
फिर नग़्मा-हा-ए-क़ुम तो फ़ज़ा में हैं गूँजते
तू ही हरीफ़-ए-ज़ौक़-ए-समाअत नहीं रहा
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
मय-ख़ाने में सौ मर्तबा मैं मर के जिया हूँ
है क़ुलक़ुल-ए-मीना मुझे क़ुम-क़ुम से ज़ियादा
इमाम बख़्श नासिख़
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हास्य
न जिस से प्यास बुझ पाए वो ''के-एम-सी'' का नल तुम हो
हक़ीक़त ये है मेरी ग़ैर-मतबूआ ग़ज़ल तुम हो
खालिद इरफ़ान
ग़ज़ल
सकत बाक़ी नहीं है क़ुम बे-इज़्निल्लाह कहने की
मसीहा भी हमारे दौर के बीमार कितने हैं
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
नज़्म
क़ुम-बि-इज़निल्लाह
جہاں اگرچہ دگر گوں ہے ، قم باذن اللہ
وہي زميں ، وہي گردوں ہے ، قم باذن اللہ
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
अहमद हुसैन माइल
नज़्म
ख़ानक़ाह
क़ुम-बि-इज़निल्लाह कह सकते थे जो रुख़्सत हुए
ख़ानक़ाहों में मुजावर रह गए या गोरकन
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
रियाज़ ख़ैराबादी
मर्सिया
ऐ मसीहा क़ौम के तुझ बिन इज़ाम-ए-ख़स्ता को
क़ुम-बे-इज़्नी कह के अब जुम्बिश में फिर लाएगा कौन