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नज़्म
रिश्वत
ख़ूब हक़ के आस्ताँ पर और झुके अपनी जबीं
जाइए रहने भी दीजे नासेह-ए-गर्दूँ-नशीं
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
अगर होता ज़माना गेसु-ए-शब-रंग का तेरे
मिरी शब-दीज़ सौदा का ज़ियादा-तर क़दम निकले
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
शिकवा नहीं है अर्ज़ है मुमकिन अगर हो आप से
दीजे मुझ को ग़म ज़रूर दिल जो मिरा उठा सके
हकीम नासिर
ग़ज़ल
मुझ तलक क़ातिल तो क़ातिल मौत भी आती नहीं
किस को दीजे जान जब ख़्वाहान-ए-जाँ कोई न हो