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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
सगान-ए-ख़ूक ज़ाद-ए-बर्ज़न ओ बाज़ार-ए-बे-मग़्ज़ी
मिरी जानिब अब अपने थोबड़े शाहाना करते हैं
जौन एलिया
नज़्म
बरसात की बहारें
कोयल की कूक में भी तेरा ही नाम हैगा
और मोर की ज़टल में तेरा पयाम हैगा
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
रूहुल-क़ुदुस की तुझ को क़सम और मसीह की
मरियम के तुझ को इफ़्फ़त-ए-दामान की क़सम
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
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ग़ज़ल
समेट रक्खे हैं रूहुल-क़ुदुस ने पर अपने
पहुँच रही है कहाँ तक इस इज़्तिराब की आँच
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
भारत के मुसलमान
गंगोह की तक़्दीस से क़ुद्दूस सरासर
पटने की ज़मीं निकहत-ए-ख़्वाजा से मोअ'त्तर
जगन्नाथ आज़ाद
नज़्म
उर्मिला
कभी कोयल की काली कूक गर कानों में पहुँची हो
तो शिरयानों में बहता ख़ून सारा जम गया होगा


