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नज़्म
व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ
रूई की तरह उड़ जाएँगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
मरने वालो आओ अब गर्दन कटाओ शौक़ से
ये ग़नीमत वक़्त है ख़ंजर कफ़-ए-क़ातिल में है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
बाग़बाँ गुलचीं को चाहे जो कहे हम को तो फूल
शाख़ से बढ़ कर कफ़-ए-दिलदार पर अच्छा लगा
अहमद फ़राज़
नज़्म
मुहासरा
सो ये जवाब है मेरा मिरे अदू के लिए
कि मुझ को हिर्स-ए-करम है न ख़ौफ़-ए-ख़म्याज़ा
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
जो रुके तो कोह-ए-गिराँ थे हम जो चले तो जाँ से गुज़र गए
रह-ए-यार हम ने क़दम क़दम तुझे यादगार बना दिया
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
अगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म है
कि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदा

