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ग़ज़ल
एक मक़ाम है जहाँ एक हैं अक्स-ओ-आइना
इश्क़ को जा के देखिए हुस्न की जल्वा-गाह में
कबीर अहमद जायसी
ग़ज़ल
ये ‘अक्स-ओ-आइना ज़ी-सूरत ओ सूरत की वहदत भी
समझने और समझाने की बातें जो हैं की मैं ने
ज़हीन शाह ताजी
ग़ज़ल
मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है
सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है
सलीम कौसर
ग़ज़ल
दश्ना-ए-ग़म्ज़ा जाँ-सिताँ नावक-ए-नाज़ बे-पनाह
तेरा ही अक्स-ए-रुख़ सही सामने तेरे आए क्यूँ
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
अक्स-ए-रुख़्सार ने किस के है तुझे चमकाया
ताब तुझ में मह-ए-कामिल कभी ऐसी तो न थी







