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नज़्म
वो सुब्ह कभी तो आएगी
जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जाएगी
वो सुब्ह हमीं से आएगी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
तदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकता
जहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
बीता दीद उम्मीद का मौसम ख़ाक उड़ती है आँखों में
कब भेजोगे दर्द का बादल कब बरखा बरसाओगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
अपनी बीती कैसे सुनाएँ मद-मस्ती की बातें हैं
'मीरा-जी' का जीवन बीता पास के इक मय-ख़ाने में
मीराजी
नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
तेरी बिना पाएदार तेरे सुतूँ बे-शुमार
शाम के सहरा में हो जैसे हुजूम-ए-नुख़ील
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
ता-ख़िलाफ़त की बिना दुनिया में हो फिर उस्तुवार
ला कहीं से ढूँढ़ कर अस्लाफ़ का क़ल्ब-ओ-जिगर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तस्वीर-ए-दर्द
जो है पर्दों में पिन्हाँ चश्म-ए-बीना देख लेती है
ज़माने की तबीअत का तक़ाज़ा देख लेती है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
हम कहते हैं ये जग अपना है तुम कहते हो झूटा सपना है
हम जन्म बिता कर जाएँगे तुम जन्म गँवा कर जाओगे
साहिर लुधियानवी
हिंदी ग़ज़ल
कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उस के बारे में
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा



