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नज़्म
याद
इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है
दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
मौज़ू-ए-सुख़न
और मुश्ताक़ निगाहों की सुनी जाएगी
और उन हाथों से मस होंगे ये तरसे हुए हात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मजबूरियाँ
वो बादल सर पे छाए हैं कि सर से हट नहीं सकते
मिला है दर्द वो दिल को कि दिल से जा नहीं सकता
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
आमिर अमीर
ग़ज़ल
यक-ब-यक घबरा के जितनी दूर हट आता हूँ मैं
और भी उस शोख़ को नज़दीक-तर पाता हूँ मैं


