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नज़्म
व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
अहद-ए-जवानी रो रो काटा पीरी में लीं आँखें मूँद
या'नी रात बहुत थे जागे सुब्ह हुई आराम किया
मीर तक़ी मीर
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
उसे तुम फ़ोन करते और ख़त लिखते रहे होगे
न जाने तुम ने कितनी कम ग़लत उर्दू लिखी होगी

