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masKH
मस्ख़ مَسْخ
शकल या हुलिये का बिगाड़, अच्छी से बुरी सूरत हो जाना, मनुष्य की की सूरत से बंदर या जांवर की सूरत में हो जाना, विकार
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नज़्म
आगही
फ़ुनून-ए-लतीफ़ा ख़ुदावंद के हुक्म-नामे, फ़रामीन
जिन्हें मस्ख़ करते रहे पीर-ज़ादे, जहाँ के अनासिर
अख़्तरुल ईमान
ग़ज़ल
तुम्हारे शौक़ में हूँ जाँ-ब-लब इक उम्र गुज़री है
अगर इक दम कूँ आ कर मुख दिखाओगे तो क्या होगा
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
मन इक नन्हा सा बालक है हुमक हुमक रह जाए है
दूर से मुख का चाँद दिखा कर कौन उसे ललचाए है
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
किस किस फूल की शादाबी को मस्ख़ करोगे बोलो!!!
ये तो उस की देन है जिस को चाहे वो महकाए
फ़रीहा नक़वी
शेर
इक दिन उस ने नैन मिला के शर्मा के मुख मोड़ा था
तब से सुंदर सुंदर सपने मन को घेरे फिरते हैं
सय्यद आबिद अली आबिद
ग़ज़ल
मिरे जीव आरसी में ख़याल तुज मुख का सो दिस्ता है
करे ऊ ख़याल मुंज दिल में निशानी ज़र-फ़िशानी का
